दैनिक सांध्य बन्धु जबलपुर। रक्षाबंधन के अगले दिन मनाया जाने वाला कजलियां पर्व, जिसे बुंदेलखंड और महाकौशल में कजलियो के नाम से जाना जाता है, शहर में धूमधाम से मनाया गया। पूरे भारत में इसे भुजरिया के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व प्रकृति और आपसी सद्भावना का प्रतीक माना जाता है, जिसमें सभी उम्र के लोग उत्साहपूर्वक शामिल हुआ।
नाग पंचमी पर बोई जाती हैं कजलियां:
यह पर्व प्राचीन काल से मनाया जा रहा है, जिसमें लोग घरों में छोटी-छोटी बांस की टोकरी में गेहूं बोते हैं। आज के दिन तक ये कजलियां, गेहूं के अंकुर के रूप में उग आती हैं। हालांकि, शहर में अब यह पर्व औपचारिकता तक सीमित रह गया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसे बहुत धूमधाम से मनाया गया।
तालाबों और नदियों के किनारे मेला:
शहर के प्रमुख तालाबों, जैसे हनुमान ताल, आधार ताल, और नर्मदा नदी के किनारे, लोग शाम को कजलियों की पूजा-अर्चना करेंगे और तालाब व नदी के जल से धोकर इस पर्व को मनाया गया। इस दौरान इन स्थानों पर मेले जैसी स्थिति रही।
किन्नरों का जुलूस रहेगा आकर्षण का केंद्र:
शाम को लकड़गंज से प्रारंभ होकर ओमती बड़ा फव्वारा और घोड़ा नक्कास होते हुए हनुमान ताल तक किन्नरों का जुलूस निकल, जिसमें शहर भर के किन्नर समाज के लोग सुंदर नृत्य के साथ शामिल हुआ। इस जुलूस को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर इकट्ठा हुआ। किन्नरों द्वारा शहर में अमन, शांति, और भाईचारे की दुआ दी।
