दैनिक संध्या बन्धु जबलपुर/नीरज यादव। मध्यप्रदेश कांग्रेस इन दिनों जीतू पटवारी के नेतृत्व में संगठन सृजन अभियान, के तहत नए नेतृत्व और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने की बात कर रही है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश में एक ऐसे नेता का दौरा चर्चा में है, जो अपने (कुशल राजनीतिक एवं जननेता) स्वर्गीय पिता की राजनीतिक विरासत को जमीन पर उतारने में अब तक सफल नहीं हो पाए, न ही कांग्रेस हाईकमान के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक उपयोगिता साबित कर सके। अब उन्होंने नया रास्ता चुना है अपने पुराने संबंधों की धूल झाड़कर अपनी ताकत का प्रदर्शन।
प्रदेशभर में उनका दौरा केवल संगठनात्मक संवाद तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा, बल्कि हर जिले में वे अपने पुराने वफ़ादरों और वर्षों पहले हाशिये पर जा चुके नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। नेता जी का हाईकमान को संदेश साफ दिखाई देता है... देखिए कि अभी भी म.प्र. में हमारा नेटवर्क जीवित है। लेकिन सवाल यह है कि... क्या केवल पुराने चेहरों की भीड़ से राजनीतिक भविष्य तय होता है? नेता जी के जबलपुर दौरे ने इस पूरी रणनीति को और स्पष्ट कर दिया है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने, युवा चेहरों को आगे लाने या जनता के मुद्दों पर संघर्ष का रोडमैप देने के बजाय उनका का पूरा फोकस उन्हीं नेताओं के इर्द-गिर्द घूमता दिखा, जिन्हें शहर की जनता कई हजार वोटों से नकार चुकी है।
उनके इस दौरे से शहर और ग्रामीण कांग्रेस के वर्तमान पदाधिकारी भी असहज दिखाई दिए। वे समझ ही नहीं पाए कि नेता जी संगठन को मजबूत करने आए है या पुराने गुटों की पुनस्थापना के लिए। राहुल गांधी जिस संगठन सर्जन की बात करते हैं, उसका मूल उद्देश्य जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे लाना और कांग्रेस को नई पीढ़ी से जोड़ना बताया जाता है। लेकिन जब उसी समय पुराने विवादित चेहरों, निष्क्रिय नेताओं और चुनावी हार के प्रतीक बन चुके लोगों के घरों में बैठकों का दौर चलता है, तब कार्यकर्ता भी सवाल पूछने लगते हैं कि आखिर पार्टी भविष्य की ओर बढ़ रही है या अतीत के मलबे में अपना अस्तित्व तलाश रही है ? जबलपुर में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखाई दी।
जिले के एक मात्र कांग्रेस के निर्वाचित विधायक, पार्षदों से संवाद, जनता से सार्वजनिक संवाद या कार्यकर्ता सम्मेलन के बजाय सीमित दायरे की बैठकों में वही पुराने चेहरे नजर आए। जिन नेताओं को जनता पहले ही 'फ्यूज बल्ब' मान चुकी है, उनकी झालरों में कांग्रेस आखिर कौन सी नई रोशनी खोज रही है-यह सवाल अब आम कार्यकर्ता भी पूछ रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यह पूरा दौरा कहीं न कहीं कांग्रेस हाईकमान को शक्ति प्रदर्शन दिखाने और भविष्य में अपना स्थान सुरक्षित करने की कोशिश अधिक लगता है। संदेश यह देने का प्रयास कि यदि हमें नजरअंदाज किया गया तो हमारे साथ एक अलग समूह खड़ा है।
म.प्र में कांग्रेस पहले से ही जनता के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही... पार्टी के लिए यह संकेत सकारात्मक कम और अंदरूनी दबाव की राजनीति अधिक दिखाई देता है। विडंबना यह है कि जिस समय भाजपा बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, उस समय कांग्रेस अब भी गुटबाजी, विरासत और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के जाल से बाहर नहीं निकल पा रही। जनता अब भावनात्मक विरासत नहीं, जमीन पर संघर्ष और विश्वसनीय नेतृत्व देखना चाहती है।
केवल पिता के नाम, पुराने संपर्कों और बंद कमरों की बैठकों से राजनीति लंबे समय तक नहीं चलती। कांग्रेस नेतृत्व को भी अब यह समझना होगा कि जनता उन चेहरों को बार-बार स्वीकार नहीं करेगी, जो हर चुनाव में हार, विवाद और अंतर्कलह का प्रतीक बन चुके हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कांग्रेस पार्टी वास्तव में पुनर्जीवन चाहती है तो उसे 'फ्यूज बल्बों' की झालर सजाने के बजाय नए दीपक जलाने होंगे।
