Jabalpur News: 800 साल पुराना है बड़ी खेरमाई मंदिर का इतिहास, मंदिर परिसर में विराजमान हैं 24 मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, 1652 से चली आ रही जवारा विसर्जन की परंपरा

दैनिक सांध्य बन्धु जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर का प्राचीन बड़ी खेरमाई माता मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। जानकारों के अनुसार, मंदिर में मां बड़ी खेरमाई की स्थापना करीब 800 वर्ष पहले कल्चुरी काल में एक चमत्कारी शिला के रूप में की गई थी। तत्कालीन कल्चुरी राजवंश के शासक खेरमाई माता को राज्य की कुलदेवी और ग्रामदेवी के रूप में पूजते थे। भानतलैया क्षेत्र में स्थापित इस प्राचीन मंदिर की परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं।

मान्यता के अनुसार, मंदिर में स्थापित आदि शिला के ऊपरी भाग में बड़ी खेरमाई माता की प्रतिमा विराजमान है। इसके दाईं ओर काल भैरव और बाईं ओर हनुमान जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर परिसर में अलग-अलग देवी-देवताओं के कुल 24 मंदिर बताए जाते हैं, जहां श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

शिला के नीचे आज भी मौजूद है प्राचीन आस्था का केंद्र

मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, जिस चमत्कारी शिला की पूजा कल्चुरी काल में की जाती थी, वह आज भी खेरमाई माता की प्रतिमा के नीचे मौजूद है। यह शिला मंदिर की प्राचीनता और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। मंदिर के परकोटे में नवशक्तियों की मूर्तियां स्थापित हैं, जिनकी स्थापना मंदिर ट्रस्ट द्वारा वर्ष 1993 में कराई गई थी।

मंदिर के दाईं ओर दूल्हादेव और बाईं ओर हरदौल की मूर्ति स्थापित है। इसके अलावा मंदिर परिसर में श्रीगणेश, हनुमान जी, माता बंजारी, मां काली, भैरव, मां दुर्गा और चौसठ योगिनी के मंदिर भी हैं। परिसर में तीन प्राचीन बावड़ियां और सैकड़ों वर्ष पुराना विशाल पीपल का वृक्ष भी मौजूद है। मंदिर में प्रवेश के लिए तीन प्रमुख द्वार हैं।

1652 से चली आ रही जवारा विसर्जन की परंपरा


बड़ी खेरमाई मंदिर की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में जवारा विसर्जन चल समारोह का विशेष स्थान है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1652 की चैत्र नवरात्रि में हुई थी। उस समय जवारा विसर्जन तत्कालीन भानतलैया के बड़े ताल में किया जाता था।

बताया जाता है कि बाद में बड़े ताल के समाप्त होने के बाद जवारा विसर्जन हनुमानताल में किया जाने लगा। इसके बाद से हनुमानताल में जवारा विसर्जन की परंपरा लगातार चली आ रही है। आज भी नवरात्रि के दौरान यह आयोजन श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ संपन्न होता है।

परंपरा के अनुसार, नवरात्रि के 11वें दिन जवारा विसर्जन चल समारोह निकाला जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। नवरात्रि में मंदिर में लगभग 700 कलश स्थापित किए जाते हैं, जिनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।

1921-22 के बंदोबस्त रिकॉर्ड में मंदिर का उल्लेख

बड़ी खेरमाई मंदिर का प्रबंधन और संचालन खेरमाई मंदिर ट्रस्ट के हाथों में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1921-22 के बंदोबस्त रिकॉर्ड में मंदिर सेवा समिति को नजूल के पट्टे आवंटित किए जाने का उल्लेख मिलता है। मध्यप्रदेश ट्रस्ट अधिनियम, 1951 के तहत बड़ी खेरमाई मंदिर ट्रस्ट, भानतलैया का पंजीयन कराया गया।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 1932-33 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल द्वारा मंदिर के तत्कालीन ट्रस्टियों पंडित गौरीशंकर और गिरधारीलाल के नाम संपूर्ण नजूल प्लॉट नंबर 182 का उल्लेख मिलता है। इस भूखंड में खेरमाई मंदिर परिसर और उससे संबंधित मंदिर शामिल बताए जाते हैं।

नवरात्रि में सुरक्षा और व्यवस्थाओं की विशेष तैयारी

नवरात्रि के दौरान बड़ी खेरमाई मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। दर्शन, पूजन और जवारा विसर्जन के आयोजन को सुव्यवस्थित बनाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नवरात्रि के दौरान करीब 250 स्वयंसेवकों को सुरक्षा एवं व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दी जाती है।

मंदिर ट्रस्ट द्वारा आय-व्यय का लेखा-जोखा चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) से ऑडिट कराने की व्यवस्था भी बताई गई है। धार्मिक अनुष्ठानों, कलश स्थापना और जवारा विसर्जन जैसी परंपराओं के माध्यम से मंदिर आज भी जबलपुर की सांस्कृतिक पहचान और जनआस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

बड़ी खेरमाई मंदिर का इतिहास, प्राचीन शिला, ऐतिहासिक अभिलेख और सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराएं इसे संस्कारधानी की विशिष्ट धरोहर बनाती हैं। पीढ़ियों से श्रद्धालु यहां मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना करते आ रहे हैं।

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