2004 में सोनिया गांधी ने क्यों ठुकराया था प्रधानमंत्री पद? बोलीं- राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं PM बनूं

दैनिक सांध्य बन्धु (एजेंसी) नई दिल्ली। कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के अपने फैसले को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि उस समय उनके बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी भी नहीं चाहते थे कि वह देश की प्रधानमंत्री बनें। सोनिया गांधी ने अपनी आगामी किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में इस फैसले के पीछे की परिस्थितियों और अपने राजनीतिक सफर से जुड़े कई अनछुए पहलुओं को साझा किया है।

10 नवंबर को लॉन्च होने वाली इस किताब को लेकर सोनिया गांधी ने अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ को दिए इंटरव्यू में विस्तार से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ अपने रिश्ते, इंदिरा गांधी, आपातकाल, कांग्रेस की विचारधारा और देश की मौजूदा राजनीति पर अपनी राय रखी।

सोनिया गांधी ने 2004 के फैसले को लेकर कहा कि उन्हें कभी इस बात का विचार नहीं आया कि यदि वह प्रधानमंत्री बनतीं तो तत्कालीन यूपीए सरकार की नीतियां और कांग्रेस की रणनीति किस तरह अलग होती। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उन्होंने एक टीम के रूप में काम किया। दोनों की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग थीं। मनमोहन सिंह सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, जबकि वह कांग्रेस पार्टी की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। उनका अनुभव कुल मिलाकर सकारात्मक रहा।

सोनिया गांधी ने अपनी किताब को व्यक्तिगत संस्मरण बताते हुए कहा कि इसमें सिर्फ राजीव गांधी के साथ उनकी प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सफर की कहानी भी है, जिसमें वह धीरे-धीरे राजीव के परिवार और भारत का हिस्सा बन गईं। उन्होंने बताया कि इसी जुड़ाव और परिवार के बलिदानों से जुड़े मूल्यों ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। जब उन्हें लगा कि पार्टी कमजोर हो रही है और जिन उद्देश्यों के लिए परिवार ने बलिदान दिए, वे खतरे में हैं, तब उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया।

राजीव गांधी से अपनी पहली मुलाकात के करीब 60 साल बाद अपने व्यक्तित्व में आए बदलाव पर सोनिया ने कहा कि वह आज भी मूल रूप से वही इंसान हैं, जिससे राजीव मिले थे। हालांकि, अब वह पहले की तुलना में कम मुस्कुराती और हंसती हैं। उन्होंने बताया कि भारत आने के बाद देश की संस्कृति, समाज और यहां के मूल्यों को समझने में राजीव गांधी और इंदिरा गांधी ने उनकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों की संवेदनशीलता, साहस, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास और कर्तव्य के प्रति समर्पण ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया।

इंटरव्यू में आपातकाल के दौर का जिक्र करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उस समय वास्तव में क्या हो रहा था और उसकी गंभीरता कितनी थी, इसकी जानकारी उन्हें आपातकाल समाप्त होने के बाद मिली। उन्होंने माना कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया और बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार को निलंबित किया गया था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तेजी से बिगड़ते हालात से निपटने के लिए संघर्ष कर रही थीं। सोनिया के मुताबिक, आपातकाल के लिए केवल संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी दबाव था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इंदिरा गांधी ने मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला लिया था और बाद में आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद जताते हुए माफी भी मांगी थी।

देश की मौजूदा राजनीति और भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा पर टिप्पणी करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उनकी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारत को लेकर सोच बिल्कुल अलग है। उन्होंने RSS, BJP और संघ परिवार की विचारधारा को लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों के लिए चुनौती बताया। सोनिया ने कहा कि कांग्रेस का मानना है कि देश के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी डर के अपने धर्म और आस्था का पालन करने का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और सफलता पर भी बात की। सोनिया ने स्वीकार किया कि मोदी अलग वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन राजनीति में सफलता हासिल करने के कई रास्ते होते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उदाहरण दिया। साथ ही कहा कि कांग्रेस को RSS से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।

सोनिया गांधी ने बताया कि अपनी जिंदगी पर लिखी गई किताबों को पढ़ने में उनकी कभी विशेष रुचि नहीं रही। उन्होंने कहा कि उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनके जीवन पर इतनी अधिक किताबें लिखी जा चुकी हैं। हालांकि, एक समय उन्हें महसूस हुआ कि दूसरे लोग लंबे समय से उनकी कहानी बताते रहे हैं, इसलिए अब उन्हें अपनी कहानी खुद सामने रखनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि किताब लिखने की शुरुआत एक दशक से भी पहले हुई थी, लेकिन गंभीरता से लेखन करीब पांच साल पहले शुरू किया। लेखन का सिलसिला लगातार नहीं चला। कभी विचार और शब्द सहजता से आते थे, तो कभी लिखना बेहद मुश्किल हो जाता था।

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