दैनिक सांध्य बन्धु भोपाल। प्रदेश में राजनीतिक दल बदलने की परंपरा के बाद अब इसके नतीजे साफ दिखने लगे हैं। जहां पहले दल बदलने से नेताओं को लाभ होता था, वहीं अब यह इतना फायदेमंद साबित नहीं हो रहा है। सागर जिले की बीना विधानसभा क्षेत्र की विधायक निर्मला सप्रे ने हाल ही में कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थामा था। लेकिन उनके इस फैसले के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति असमंजस में है।
दल बदलने का निर्णय: निर्मला सपरे का असमंजस
निर्मला सपरे ने लोकसभा चुनाव के आसपास 5 मई को बीजेपी जॉइन की थी, लेकिन इसके बाद से उनकी सक्रियता सवालों के घेरे में है। चार महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा नहीं दिया है। यह स्थिति सवाल उठाती है कि क्या उन्हें बीजेपी में वादे के अनुसार सब कुछ नहीं मिला है या फिर उन्हें डर है कि वह भविष्य में इमरती देवी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं।
इमरती देवी और निर्मला सप्रे का तुलनात्मक अध्ययन
इमरती देवी, जो पहले कांग्रेस की ओर से डबरा विधानसभा क्षेत्र की विधायक थीं और कमलनाथ सरकार में मंत्री रही, उन्होंने 2020 में बीजेपी का दामन थामा था। हालांकि, उपचुनाव में कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार, निर्मला सप्रे की भी स्थिति संदेहपूर्ण है, खासकर बीना क्षेत्र में जहां बीजेपी का दबदबा रहा है। बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी और सपरे के सिंधिया जैसा समर्थन न होने के कारण उनकी स्थिति कमजोर दिख रही है।
इस्तीफे का प्रश्न और राजनीतिक अनिश्चितता
निर्मला सप्रे के इस्तीफा न देने की मुख्य वजह शायद यही है कि उन्हें बीजेपी से वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। सूत्रों के अनुसार, निर्मला सप्रे ने बीना को जिला बनाने और अन्य विकास कार्यों की शर्तें रखी थीं, जो अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। इस कारण उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया है।
भविष्य की राजनीतिक दिशा
इससे यह संकेत मिलता है कि बीजेपी अब दल बदलू नेताओं के साथ पहले जैसी स्थिति नहीं है। राम निवास रावत जैसे नेता, जिन्हें उपचुनाव जीतने से पहले मंत्री पद दिया गया था, अब भी आंतरिक विरोध का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि 2020 के बाद जोर पकड़ने वाला दल बदल का फिनोमिना अब धीमा पड़ रहा है।क्या बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने से निर्मला सपरे बीना सीट से हार जाएंगी?
