दैनिक सांध्य बन्धु बड़वाह। प्रसिद्ध संत सियाराम बाबा ने बुधवार सुबह 6:10 बजे अंतिम सांस ली। वह पिछले तीन सप्ताह से अस्वस्थ थे और आश्रम में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य में आंशिक सुधार बताया था, लेकिन अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने से वह ब्रह्मलीन हो गए। बाबा के देहावसान से उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई है। बाबा का अंतिम संस्कार बुधवार शाम 4 बजे आश्रम परिसर में होगा।
सियाराम बाबा मूल रूप से गुजरात के कठियावाड़ क्षेत्र के निवासी थे। 17 वर्ष की आयु में घर त्यागकर उन्होंने सन्यास जीवन अपना लिया। 22 वर्ष की आयु में उन्होंने मौन धारण कर लिया और मौन तोड़ने पर सबसे पहले "सियाराम" शब्द कहा। तभी से वह सियाराम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
उनका वास्तविक नाम और परिवार के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाबा ने सात दशकों तक रामायण पाठ और श्रीराम की धुन को अपनी साधना का केंद्र बनाया। उनकी उपस्थिति में हमेशा भक्तों द्वारा रामायण पाठ और सियाराम की धुन गूंजती रहती थी।
सियाराम बाबा ने नर्मदा किनारे नागलवाड़ी धाम, खारघर, और विंध्यवासिनी मां पार्वती मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए 25 लाख रुपए से अधिक की राशि दान दी। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए भी उन्होंने 2 लाख रुपए का दान भेजा था। इसके अलावा, बाबा ने यात्री प्रतीक्षालय और अन्य सामाजिक कार्यों में भी योगदान दिया।
सियाराम बाबा अपने अनुयायियों से केवल 10 रुपए भेंट स्वरूप स्वीकार करते थे। उनकी सादगी, समाजसेवा, और श्रीराम के प्रति उनकी असीम भक्ति ने उन्हें भक्तों के बीच पूजनीय बना दिया। उनके अनुयायियों का कहना है कि बाबा का जीवन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत था।
