दैनिक सांध्य बन्धु भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर अंदरूनी सियासत उफान पर है। वजह है राज्यसभा की वह अहम सीट, जो वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का कार्यकाल पूरा होने के बाद 9 अप्रैल को खाली होने जा रही है। जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि दिग्विजय सिंह तीसरी बार राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं, वैसे ही कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संतुलन और सामाजिक समीकरणों को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। पार्टी के गलियारों में इसे एक “हाई-वोल्टेज वैकेंसी” माना जा रहा है।
दिग्विजय सिंह के हटते ही दावेदारों की कतार
दिग्विजय सिंह के पीछे हटते ही कांग्रेस में संभावित दावेदारों की लंबी फेहरिस्त सामने आ गई है। सबसे ऊपर नाम आता है पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का, जिनकी दिल्ली तक मजबूत पकड़ मानी जाती है। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के नाम भी सियासी चर्चाओं में लगातार उछल रहे हैं। हर खेमे के अपने-अपने तर्क हैं—कोई अनुभव की बात कर रहा है तो कोई संगठनात्मक मजबूती की। नतीजा यह है कि एक ही राज्यसभा सीट ने प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर से गर्म कर दिया है।
कमलनाथ बनाम अरुण यादव की चर्चा सबसे तेज
हालांकि दावेदार कई हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा सबसे ज्यादा कमलनाथ और अरुण यादव के बीच संभावित मुकाबले की है। कमलनाथ जहां पार्टी के सबसे वरिष्ठ चेहरों में गिने जाते हैं, वहीं अरुण यादव को पिछड़ा वर्ग और संगठनात्मक संतुलन के लिहाज से मजबूत दावेदार माना जा रहा है। ऐसे में सवाल यही है—क्या कांग्रेस अनुभव और दिग्गज चेहरे पर दांव लगाएगी या फिर नए संतुलन के साथ आगे बढ़ेगी?
सामाजिक समीकरण ने बढ़ाई हाईकमान की मुश्किल
इस सियासी खींचतान के बीच अब सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी सामने आ गया है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दिग्विजय सिंह को पत्र लिखकर मांग की है कि इस बार राज्यसभा में अनुसूचित जाति वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया जाए। उनका तर्क है कि कांग्रेस हमेशा सामाजिक न्याय की बात करती रही है, ऐसे में वंचित वर्गों को उचित अवसर देना पार्टी की वैचारिक जिम्मेदारी है। इस पत्र के बाद मामला सिर्फ नामों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जातीय और सामाजिक संतुलन का सवाल भी पूरी मजबूती से खड़ा हो गया है।
हाईकमान के सामने दोहरी चुनौती
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर दिग्गज नेताओं की दावेदारी है, जिनकी अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत और दबाव है। दूसरी ओर सामाजिक समीकरणों को साधने की मजबूरी, ताकि पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत बना रहे। ऐसे में फैसला आसान नहीं होगा। हर नाम के साथ फायदे और नुकसान जुड़े हैं, और एक गलत निर्णय पार्टी के भीतर नई खेमेबाजी को जन्म दे सकता है।
फैसला जो तय करेगा सियासी दिशा
अब सबकी नजरें कांग्रेस हाईकमान पर टिकी हैं। क्या कांग्रेस जातीय और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता देगी, या फिर वरिष्ठता और राजनीतिक अनुभव को तरजीह मिलेगी?
फिलहाल इतना तय है कि राज्यसभा की यह एक सीट मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति को एक बार फिर केंद्र में ले आई है और आने वाले दिनों में यह सियासी घमासान और तेज होने वाला है।
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