दैनिक सांध्य बन्धु (एजेंसी) मुंबई। हिंदी सिनेमा के महान गायक और अभिनेता किशोर कुमार की 97वीं जयंती पर उनके जीवन से जुड़े कई रोचक और प्रेरणादायक किस्से एक बार फिर चर्चा में हैं। 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार ने अभिनय, निर्देशन और फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाया, लेकिन उनकी असली पहचान उनकी अनूठी आवाज बनी।
बचपन में पैर में लगी गहरी चोट और लंबे समय तक रोने के कारण उनकी आवाज का अलग टेक्सचर बना, जिसे आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान माना गया। इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कैंटीन का "पांच रुपया बारह आना" उधार बाद में उनके मशहूर गीत "पांच रुपैया बारह आना" की प्रेरणा बना।
किशोर कुमार मुंबई अभिनेता बनने नहीं, बल्कि अपने आदर्श के.एल. सहगल की तरह गायक बनने आए थे। हालांकि बड़े भाई अशोक कुमार की वजह से उन्हें फिल्मों में अभिनय का मौका मिला और वे एक सफल अभिनेता भी बने।
साल 1971 की क्लासिक फिल्म 'आनंद' पहले उन्हें ऑफर किए जाने की चर्चा रही। एक गलतफहमी और बाद में सिर मुंडवाकर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से की गई उनकी मजाकिया मुलाकात के कारण फिल्म उनके हाथ से निकल गई और यह भूमिका राजेश खन्ना को मिली, जो उनके करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हुई।
शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद किशोर कुमार ने अपनी मौलिक गायकी से संगीत जगत में अलग पहचान बनाई। सचिन देव बर्मन ने उनकी प्राकृतिक प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपनी शैली बनाए रखने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और बप्पी लाहिड़ी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ कई सुपरहिट गीत दिए।
लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के प्रति उनका सम्मान भी मिसाल माना जाता है। कहा जाता है कि वे लता मंगेशकर से एक रुपया कम फीस लेने की बात करते थे, जबकि एक बार रफी साहब से अधिक पारिश्रमिक मिलने पर निर्माता से उनका भुगतान बढ़ाने का आग्रह किया था।
उनकी निजी जिंदगी भी कई अनोखे किस्सों से भरी रही। बताया जाता है कि खराब हो चुकी अपनी पहली कार को कबाड़ में बेचने के बजाय उन्होंने बंगले के परिसर में दफना दिया और कई दिनों तक उसका शोक मनाया। वहीं पेड़ों से बातें करना, घर में नकली खोपड़ियां और लाल रोशनी लगवाना तथा मीडिया से अलग अंदाज में मिलना उनकी विचित्र लेकिन चर्चित आदतों में शामिल था।
किशोर कुमार को शुरुआती दौर में स्टेज पर गाने से डर लगता था। अभिनेता सुनील दत्त ने उन्हें भारतीय सैनिकों के सामने प्रस्तुति देने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद उनका स्टेज फियर हमेशा के लिए खत्म हो गया।
मुंबई में वर्षों रहने के बावजूद उनका दिल हमेशा अपने पैतृक शहर खंडवा में बसता था। 13 अक्टूबर 1987 को मुंबई में उनका निधन हुआ और उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार खंडवा में किया गया। आज भी किशोर कुमार को भारतीय फिल्म संगीत के सबसे बहुमुखी और लोकप्रिय कलाकारों में गिना जाता है।
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