दैनिक सांध्य बन्धु जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर में जब से नया वित्तीय वर्ष का शराब ठेका हुआ है, तब से शराब के शौकीनों की जेब पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है। शहर की अधिकांश शराब दुकानों में तय दाम यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) से कहीं अधिक कीमत पर शराब बेची जा रही है। सूत्रों की मानें तो कुछ समय पूर्व ही बड़े शराब ठेकेदारों ने मिलकर एक 'सिंडिकेट' (गुट) तैयार किया है, और इसी सिंडिकेट के इशारे पर पूरे शहर में मनमाने दामों पर शराब की बिक्री का खेल चल रहा है।
130 का पौवा 150 में, 200 की बीयर 250 में
सिंडिकेट लागू होने के बाद से शराब की कीमतों में रातों-रात 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी गई है। शहर की अलग-अलग दुकानों में एक ही ब्रांड के दाम अलग-अलग देखने को मिल रहे हैं। जिन कंपोजिट व देशी-विदेशी शराब दुकानों में अंग्रेजी शराब का पौवा ₹130 में मिलना चाहिए, वहां ग्राहकों से सीधे ₹150 वसूले जा रहे हैं। ₹200 की MRP वाली बीयर की बोतल को ₹230 से लेकर ₹250 तक में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। ग्राहकों का कहना है कि हर दुकान ने अपने खुद के रेट तय कर लिए हैं। जो ठेकेदार इस सिंडिकेट का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें आबकारी विभाग के अधिकारी परेशान कर रहे हैं, ताकि वे भी इस अवैध वसूली के खेल में शामिल हो जाएं।
"जहां शिकायत करना हो कर दो..." कर्मचारियों की दबंगई
अवैध वसूली का विरोध करने वाले ग्राहकों के साथ दुकानों पर तैनात कर्मचारी बदसलूकी और दबंगई पर उतर आते हैं। नियमानुसार हर दुकान पर रेट लिस्ट का बोर्ड लगा होना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश दुकानों से रेट लिस्ट गायब कर दी गई है ताकि ग्राहकों को सही कीमत का पता ही न चले। हद तो तब हो जाती है जब कोई जागरूक ग्राहक इस ओवररेटिंग का पक्का बिल (रसीद) मांगता है। कर्मचारी साफ मना कर देते हैं। ज्यादा बहस करने पर कर्मचारी दो टूक लहजे में कहते हैं— "जिससे और जहां शिकायत करना हो कर दो, हमारे ठेकेदार की ऊपर तक तगड़ी पहुंच है, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
कलेक्टर बदले, कार्रवाई ठंडे बस्ते में गई
ठेके की अनिवार्य शर्तों के अनुसार हर शराब दुकान पर एक 'क्यूआर कोड' (QR Code) लगा होना चाहिए, जिसे स्कैन करके ग्राहक आबकारी विभाग के पोर्टल पर शराब की सही कीमत जान सकें। पूर्व में जब यह मामला गरमाया था, तो तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना ने सख्त रुख अपनाते हुए पटवारियों की ड्यूटी लगाई थी। पटवारियों ने दुकानों पर जाकर जांच की और ओवररेटिंग पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई भी की थी। लेकिन जैसे ही तत्कालीन कलेक्टर का जबलपुर से स्थानांतरण हुआ, आबकारी विभाग ने पूरी कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
हर शनिवार जाता है 'कमीशन'...!
इस पूरे गौरखधंधे में आबकारी विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि विभाग के बड़े अधिकारियों को इस लूट की बखूबी खबर है, लेकिन 'मलाई' के चक्कर में वे आंखें मूंद कर बैठे हैं। चर्चा है कि विभाग में अब "पहले दाम और फिर बाद में काम" की तर्ज पर काम हो रहा है। हर शनिवार को सिंडिकेट की प्रत्येक दुकान से आबकारी के कारिंदों तक मोटा कमीशन (हफ्ता) पहुंच रहा है।
130 का पौवा 150 में, 200 की बीयर 250 में
सिंडिकेट लागू होने के बाद से शराब की कीमतों में रातों-रात 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी गई है। शहर की अलग-अलग दुकानों में एक ही ब्रांड के दाम अलग-अलग देखने को मिल रहे हैं। जिन कंपोजिट व देशी-विदेशी शराब दुकानों में अंग्रेजी शराब का पौवा ₹130 में मिलना चाहिए, वहां ग्राहकों से सीधे ₹150 वसूले जा रहे हैं। ₹200 की MRP वाली बीयर की बोतल को ₹230 से लेकर ₹250 तक में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। ग्राहकों का कहना है कि हर दुकान ने अपने खुद के रेट तय कर लिए हैं। जो ठेकेदार इस सिंडिकेट का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें आबकारी विभाग के अधिकारी परेशान कर रहे हैं, ताकि वे भी इस अवैध वसूली के खेल में शामिल हो जाएं।
"जहां शिकायत करना हो कर दो..." कर्मचारियों की दबंगई
अवैध वसूली का विरोध करने वाले ग्राहकों के साथ दुकानों पर तैनात कर्मचारी बदसलूकी और दबंगई पर उतर आते हैं। नियमानुसार हर दुकान पर रेट लिस्ट का बोर्ड लगा होना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश दुकानों से रेट लिस्ट गायब कर दी गई है ताकि ग्राहकों को सही कीमत का पता ही न चले। हद तो तब हो जाती है जब कोई जागरूक ग्राहक इस ओवररेटिंग का पक्का बिल (रसीद) मांगता है। कर्मचारी साफ मना कर देते हैं। ज्यादा बहस करने पर कर्मचारी दो टूक लहजे में कहते हैं— "जिससे और जहां शिकायत करना हो कर दो, हमारे ठेकेदार की ऊपर तक तगड़ी पहुंच है, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
कलेक्टर बदले, कार्रवाई ठंडे बस्ते में गई
ठेके की अनिवार्य शर्तों के अनुसार हर शराब दुकान पर एक 'क्यूआर कोड' (QR Code) लगा होना चाहिए, जिसे स्कैन करके ग्राहक आबकारी विभाग के पोर्टल पर शराब की सही कीमत जान सकें। पूर्व में जब यह मामला गरमाया था, तो तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना ने सख्त रुख अपनाते हुए पटवारियों की ड्यूटी लगाई थी। पटवारियों ने दुकानों पर जाकर जांच की और ओवररेटिंग पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई भी की थी। लेकिन जैसे ही तत्कालीन कलेक्टर का जबलपुर से स्थानांतरण हुआ, आबकारी विभाग ने पूरी कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
हर शनिवार जाता है 'कमीशन'...!
इस पूरे गौरखधंधे में आबकारी विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि विभाग के बड़े अधिकारियों को इस लूट की बखूबी खबर है, लेकिन 'मलाई' के चक्कर में वे आंखें मूंद कर बैठे हैं। चर्चा है कि विभाग में अब "पहले दाम और फिर बाद में काम" की तर्ज पर काम हो रहा है। हर शनिवार को सिंडिकेट की प्रत्येक दुकान से आबकारी के कारिंदों तक मोटा कमीशन (हफ्ता) पहुंच रहा है।
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