दैनिक सांध्य बन्धु जबलपुर। देशभर के कैंटोनमेंट बोर्डों में पिछले करीब छह वर्षों से चुनाव नहीं होने का मामला अब अदालत तक पहुंच गया है। कैंट बोर्ड के चुनाव नहीं कराए जाने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है और रक्षा मंत्रालय तथा रक्षा संपदा विभाग को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है।
2015 में हुए थे आखिरी चुनाव
जानकारी के अनुसार कैंटोनमेंट बोर्डों में अंतिम बार 2015 में चुनाव कराए गए थे। बोर्ड का कार्यकाल 2020 में समाप्त हो गया था, लेकिन इसके बाद से अब तक नए चुनाव नहीं कराए गए।
इस दौरान बोर्डों का प्रशासनिक कामकाज नियुक्त (नॉमिनेट) सदस्यों और अधिकारियों के जरिए चलाया जा रहा है। लंबे समय से चुनाव नहीं होने के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
रक्षा मंत्रालय ने बढ़ाई भंग बोर्ड की अवधि
हाल ही में 10 फरवरी को रक्षा मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर कई कैंटोनमेंट बोर्डों को भंग रखे जाने की अवधि एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी। साथ ही जिन बोर्डों में नामांकित सदस्य नियुक्त किए गए हैं, उनके कार्यकाल को भी एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
इस निर्णय के बाद राजनीतिक दलों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया है।
मर्जर योजना भी अधर में
केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले देशभर के कैंटोनमेंट बोर्डों को नगर निगमों में मर्ज करने की योजना बनाई थी। इसके लिए कई जगहों पर ड्रोन सर्वे कराकर जमीन का आकलन भी किया गया था, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए।
हालांकि यह योजना अभी तक पूरी नहीं हो सकी और न ही चुनाव कराए गए, जिससे स्थिति और उलझती जा रही है।
हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले को गंभीर माना और केंद्र सरकार से सवाल किया कि पिछले कई वर्षों से कैंटोनमेंट बोर्ड के चुनाव क्यों नहीं कराए गए।
अदालत ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक बिना चुनाव के प्रशासन चलाना उचित नहीं है। इसी को लेकर कोर्ट ने केंद्र सरकार और रक्षा संपदा अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जबलपुर हाईकोर्ट में भी लंबित है याचिका
सूत्रों के अनुसार कैंटोनमेंट बोर्ड चुनाव को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में भी एक याचिका पहले से लंबित है। वहीं अब दिल्ली हाईकोर्ट में दायर नई याचिका के बाद इस मुद्दे ने राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है।
जनता को नहीं मिल रहा प्रतिनिधि चुनने का अधिकार
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से चुनाव नहीं होने के कारण क्षेत्र की जनता अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित है। इसके चलते कई स्थानीय समस्याओं और विकास कार्यों पर भी असर पड़ रहा है।
अब लोगों की नजरें 11 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस मामले में आगे की दिशा तय हो सकती है।
2015 में हुए थे आखिरी चुनाव
जानकारी के अनुसार कैंटोनमेंट बोर्डों में अंतिम बार 2015 में चुनाव कराए गए थे। बोर्ड का कार्यकाल 2020 में समाप्त हो गया था, लेकिन इसके बाद से अब तक नए चुनाव नहीं कराए गए।
इस दौरान बोर्डों का प्रशासनिक कामकाज नियुक्त (नॉमिनेट) सदस्यों और अधिकारियों के जरिए चलाया जा रहा है। लंबे समय से चुनाव नहीं होने के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
रक्षा मंत्रालय ने बढ़ाई भंग बोर्ड की अवधि
हाल ही में 10 फरवरी को रक्षा मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर कई कैंटोनमेंट बोर्डों को भंग रखे जाने की अवधि एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी। साथ ही जिन बोर्डों में नामांकित सदस्य नियुक्त किए गए हैं, उनके कार्यकाल को भी एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
इस निर्णय के बाद राजनीतिक दलों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया है।
मर्जर योजना भी अधर में
केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले देशभर के कैंटोनमेंट बोर्डों को नगर निगमों में मर्ज करने की योजना बनाई थी। इसके लिए कई जगहों पर ड्रोन सर्वे कराकर जमीन का आकलन भी किया गया था, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए।
हालांकि यह योजना अभी तक पूरी नहीं हो सकी और न ही चुनाव कराए गए, जिससे स्थिति और उलझती जा रही है।
हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले को गंभीर माना और केंद्र सरकार से सवाल किया कि पिछले कई वर्षों से कैंटोनमेंट बोर्ड के चुनाव क्यों नहीं कराए गए।
अदालत ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक बिना चुनाव के प्रशासन चलाना उचित नहीं है। इसी को लेकर कोर्ट ने केंद्र सरकार और रक्षा संपदा अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जबलपुर हाईकोर्ट में भी लंबित है याचिका
सूत्रों के अनुसार कैंटोनमेंट बोर्ड चुनाव को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में भी एक याचिका पहले से लंबित है। वहीं अब दिल्ली हाईकोर्ट में दायर नई याचिका के बाद इस मुद्दे ने राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है।
जनता को नहीं मिल रहा प्रतिनिधि चुनने का अधिकार
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से चुनाव नहीं होने के कारण क्षेत्र की जनता अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित है। इसके चलते कई स्थानीय समस्याओं और विकास कार्यों पर भी असर पड़ रहा है।
अब लोगों की नजरें 11 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस मामले में आगे की दिशा तय हो सकती है।
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